Pages

Tuesday, February 22, 2011

......

एक घर हिन्दू का
दूजा मुस्लमान का
अगल-बगल
सारी बस्ती ही जैसे यूँ ही बसी है|
फिर भी यहाँ दंगे नहीं होते!

क्योंकि इस बस्ती में बस किरायेदार रहते हैं|

Tuesday, December 21, 2010

दो बूँद.......... ज़िन्दगी की

बस
दो बूँद,
ज़िन्दगी की।

कितनी हकीकत है,
मालूम नहीं।

ढूँढने निकलते हैं,
तो कुछ बच्चे,
आज भी मिल जाते हैं,
सड़क के किनारे।
लंगड़ाते हुए,
और पता नहीं कितने होंगे,
जो लंगड़ा भी नहीं सकते।

एक और योजना।

दो बूँद, ज़िन्दगी की।

कभी,
जब महफिलों में
बैठ जाते हैं।
जाम टकराते हैं,
पैमाने खाली होते जाते हैं,

उन्हें भरते रहो,
पीने के बाद होश नहीं रहता,
लोग कहते हैं,
क़त्ल तक हो जाते हैं।

दो बूँद, ज़िन्दगी की।

कभी रास्तों पे निकले हो,
रातों में, किसी दुखियारे की चीख सुनके?
किसी के घर में चोरी हुई;
हमें क्या, सुबह देखेंगे।
कहीं दंगे, कहीं फसाद,
और भी न जाने क्या-क्या...

फिर भी,
इस तिश्नगी का कमाल देखो।
लोग निकलते हैं,
काले-बाज़ार की तलाश में
रातों के अंधियारे में,

काश कोई कभी बचा हो,
इन खुद न सम्हले हुयों की वजह से।

दो बूँद, ज़िन्दगी की।

Friday, December 17, 2010

चौराहा और ज़िन्दगी

चौराहा,
सड़क का किनारा,
चीखती मोटर,
मचलते लोग।

अरे अभी बचा,एक्सिडेंट हो जाता
वो देखो रिक्शे और जीप की टक्कर।

किसी ने कुछ पूछा क्या_
हाँ अंकल ने बता दिया;
तुम्हारी उम्र - ४०
अंकल की - ३५
फिर वो अंकल कैसे हुए?

वो देखो,
राय साहब की लाइन ख़राब है।
गड्ढा खुद रहा है।
अरे ऐसा तो है ही,
"खुले गड्ढे बहता पानी, सरकार को कोसते लोग"
गड्ढा भर जाने दो।
कल फिर सब सरकार को कोसेंगे।

अरे भाई एक सिगरेट देना,
छुट्टा देना साहब_
पर बाबु जी को तो तुने १०० रुपये में भी गुटके के लिए मन नहीं किया!
वो रोज आते हैं न_

द हिन्दू, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, चम्पक मनोरमा,
कुछ लोग खरीदते हैं आज भी_
लगा के रखी है दुकान मऊटे ने, फुटपाथ पे।
जमीन की कीमत- १० रुपये रोजाना।
ऐसे कई मऊटे हैं,
सामान फुटपाथ पे_
फुट, सड़कों पे_
गाड़ियाँ जाम में।
जाम की कीमत-
भला कब से तुम्हारे शहर में वक़्त की कीमत लगाई जाती है?

बस इंकवायरी
अरे उनसे मत पूछो,
वो ट्रांसपोर्ट में सरकारी आदमी है।
२ रुपये की मूंगफली के साथ
बस डायरेक्टरी मिलती है- फ्री एंड एक्युरेट।

चलो मेरी बस आ गयी।
में चलता हूँ,
कुछ और चोरहों के बाद_
मेरा चौराहा है,
येही ज़िन्दगी,
वही रुकेंगे_फिर मिलेंगे।

ये तो रोजमर्रा की ज़िन्दगी है।
बस चलती रहेती है।

Tuesday, October 19, 2010

भाग-३

इन कामों में सक्रिय भागीदारी करने की एक और महत्वपूर्ण वजह थी, वो ये कि गौरव जिस घर में पहुँचा था वहां पैसे खर्च करने वाले तो कई थे पर व्यवस्थायों को मूर्त रूप देने का सामर्थ्य किसी में न था। वहां काम बताने, करवाने के लिए बड़े तो थे, पर जिम्मेदारी से किसी काम को करने, देखने के लिए जो समझदारी चाहिए वो किसी में न थी, और इसीलिए जब गौरव वहाँ पहुंचा तो काम अंजाम की तरफ बढ़ने शुरू हुए।

रोज़ सूरज की पहली किरण के साथ वह शख्स अपने काम में लग जाता था जिसने शायद कभी ही सुबह जल्दी उठने की जहमत उठाई हो। स्कूल के दिनों की वेबसी छोड़ दें तो फिर गौरव ने कभी ये न किया और अब जबकि वह ऐश्वार्यता की ओर अग्रसर था और एक प्रथिष्ठित कम्पनी में आदरपूर्ण पद पर विराजमान, तब तो उसे कतई ये करने की जरूरत न थी। लेकिन फिर भी दिल के किसी कोने से उठती आवाज़ उसे ये सब करने को मजबूर कर देती थी। वह आश्चर्यचकित था कि वह क्यों अपने उसूल "मार दो या मरो" से भागा जा रहा है। क्यों वह उन लोगों की मदद कर रहा है जिन्होंने उसकी विषम परिस्थितियों में सहारा देना तो दूर कभी भी जलील करने का एक अवसर भी नहीं छोड़ा? क्या ये फिर से एक शोषणपूर्ण स्थिति नहीं? परन्तु इन प्रश्नों के उत्तर उसे मानसिक द्वंद्व में पहुंचाकर ही छोड़ते थे। उसे कभी भी, कम से कम शादी की तैय्यारियाँ पूरी होने तक तो इन प्रश्नों के ऐसे उत्तर न मिले जिससे वह उन जिम्मेदारियों को तार्किक और न्यायपूर्ण ढंग से पीठ दिखा सके। जो लोग हमेशा एक अलग सोच के साथ काम करना पसंद करते हैं; वे कई बार अपने भूत से ज्यादा अपनी तार्किक शक्ति और वर्तमान कि स्थितियों को महत्व दिया करते हैं। आज उसे लगा की उसके फैसले उसके अपने न होने की कोई वजह है जो उसे अभी भी समझ में नहीं आ रही है।

{५}
शादी का दिन आ गया। तय्यरियाँ पूरी हो चुकी थीं और सिर्फ मस्ती बाकी थी, सारे लोग, मेहमान जुड़ना शुरू हो गए थे, लेकिन गौरव, जिसने शादी की लगभग सारी तय्यरियाँ खुद ही और बखूबी की थीं, को आराम कम था। जिम्मेदारियों के साथ आराम नहीं चला करता। किसी भी चीज की ज़रुरत के लिए वो केंद्र बन चुका था। लोग उसके सलाह के बिना जल्दी काम भी नहीं करना पसंद कर रहे थे। इतनी तवज्जो किसी को भी खाशम -खास बना देती है, और ऐसा था भी।
हालाँकि पिछले २-३ दिन गौरव के लिए काफी थकानभरे बीते, मगर इन दिनों में उसकी दोस्ती और जान-पहचान कई लोगों से हुई। इनमें एक थी प्रिया। वैसे तो शादी के घर में अधिकतर लोगों का मुख्या काम सिर्फ मस्ती करना ही था, मगर प्रिया गौरव से इस कदर प्रभावित हुई की उसे दिल दे बैठी। फिर बाकि के दिन उसने अपनी सहेलियों के साथ नहीं, औरतों के बीच नहीं, प्रथाओं के निर्वाह की औपचारिकता पूरी करते नहीं बिताये; अपितु गौरव का ख्याल रखने में बिताये।
शेष फिर...

Sunday, October 17, 2010

भाग - २

गौरव को एक बार एक ऐसे रिश्तेदार के यहाँ शादी में जाना पड़ा, जिन्होंने उसका और उसके परिवार का पोषण नहीं शोषण किया था। गौरव वहां किसी भी प्रकार से न जाना चाहता था, न ही उसकी इस शादी में किसी भी प्रकार की दिलचस्पी थी। ज़िन्दगी जीने की उसकी अपनी अलग परिभाषा थी. उसके लिए ज़िन्दगी जीने का सिर्फ एक उसूल था, "जीना है तो लड़ना पड़ेगा"। सतत, सभी से, कमजोर व कठिन दोनों ही परिस्थितियों में और अगर जीना है तो जीतना पड़ेगा। ये जंगल का कानून नहीं जीवन की सच्चाई है। "मार दो या मरो", मार दो उन सारी कठिनाइयों को जो जीवन में बाधक हैं; मार दो उन सारी महत्वाकान्क्षायों को जो प्रगति में रोढा हैं। मार दो, ख़त्म कर दो उन रिश्तों को जो पोषते नहीं अपितु नोचते जरूर हैं। लेकिन कुछ चीज़ों का निर्वहन औपचारिकताओं की पूर्ति भर के लिए ही सही, जरूरी है। ऐसी औपचारिकताएं इसलिए भी जरूरी हैं की ये लोग, बे-वक़्त की अंतिम आशा के रूप में कभी काम भी आ सकते हैं। इसलिए गौरव न सिर्फ उस शादी में गया, बल्कि उसे कुछ दिन पहले भी जाना पड़ा।

{३}
दुल्हन की अपनी खरीददारी और शादी में आने वाले मेहमानों को दिए जाने वाले गिफ्ट, बस दो ही व्यवस्थाएं पहले हुयीं थीं। इसके अलावा बाकी सारे काम बस इन्हीं कुछ दिनों में पूरे हुए। स्वागत की तय्यारी से लेकर ठहरने की व्यवस्था तक; खानसामों की, पंडालों की यहाँ तक की शादी में आने वाले मेहमानों के लिए बनने वाले भोज्य और प्रसादों की भी। गौरव को जाते ही इन कामों में लगना पड़ा।

{४}

क्या किसी अनुत्तरित प्रश्न को छोड़ना ज़रूरी है? या किसी प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ना? क्या यह ज़रूरी है की आपकी सोच, आपकी परिस्थितियों की या आपकी वास्तविकता का रुख बदल देंगी? शायद नहीं, इसलिए जीवन का हर वो फैसला जो आप पर लागू होता है हमेशा आपकी सोच का आईना नहीं होता, हमेशा वो प्रश्न जिनके जवाब आप ढूंढते रह जाते हैं, ताउम्र आपको परेशान करते रहते हैं कई बार आपके होते ही नहीं वरन उन परिस्थियों से पैदा हुए होते हैं जिन पर आपका कोई बस नहीं होता।
औपचारिक रूप से ही सही, कुछ दिन पहले जाना और उसके बाद शादी के कामों में लगना कुछ ऐसे फैसले थे, जिन पर उसका अपना कोई बस न था।

(जारी...)

Saturday, October 16, 2010

{१}
आपकी ज़िन्दगी, आपके फैसले, क्या सचमुच आपके हैं? हो सकता है, अपनी महानता साबित करने का या किसी और को नीचा दिखने का उद्देश्य इसे "हाँ" में उत्तर वाला प्रश्न बना दें पर ये सदैव सच नहीं होता, या यूँ कहें की अधिकांश व्यक्तियों के फैसले उनके अपने नहीं होते।

आपकी अपनी ज़िन्दगी पे फर्क पड़ता है कुछ उन जिंदगियों से जो हमेशा आपकी ज़िन्दगी के साथ चलती हैं। इनके सुख दुःख में, किसी विशेष परिस्तिथि में या विषमता में; आप अपने फैसलों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष असर पते हैं। ये आपकी ज़िन्दगी पे असर डालते हैं। ऐसा कोई भी जानने वाला रिश्तेदार या उनके सदृश होता है, पर अगर ऐसा नहीं होता तो वे रिश्ते जो खून के रिश्तों में गिने जाते हैं या आते हैं, मगर अपना असर नहीं छोड़ पाते, बेमानी कहे जा सकते हैं।

इससे पृथक भी रिश्तों की परिभाषा है, ये वो बंधन हैं, जो जनम के साथ, या उसके बाद, कभी भी किसी से भी बंध सकते हैं। सब कुछ निर्भर करता है आपके दिल व दिमाग पर और फिर उसी प्रकार ये बंधन टूटते भी हैं, आपके दिल और दिमाग की निर्भरता पर। आपकी ज़िन्दगी की लता अगर किसी वृक्ष या किसी और आधार का सहारा पाकर आगे बढती है तो उस सहारे को आगे लेकर बढ़ना ज़रूरी तो है ही, उस सहारे का शुक्रगुजार होना भी परम-आवश्यक है।

लेकिन अगर परिस्थितियां भिन्न हों और आपको पनपने का सहारा देने की बात तो दूभर, उलटे आपको सुखाने के ही प्रयास हो रहे हों, तो उस स्तिथि में अपने को अमरबेल बनाकर, अपना पोषण करने में क्या हर्ज़ है? दूसरों की चिंता का तो प्रश्न ही नहीं उठता, उसे ख़तम करने में भी कोई हर्ज़ नहीं।

{२}

गौरव गोपाल खन्ना... । ऐश्वर्यता उसके अंग-अंग से टपकती थी। वह खुश-मिजाज था, शरीर से सबल व रूप और गुण दोनों में ही औसत। अगर वह इतना अच्छा न था की लोग उसे देखते ही उसकी तारीफ करने को मजबूर हो जायें तो इतना बुरा भी नहीं था की उसके पीठ पीछे लोग उसकी बुराई करें। उसे गुणी इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पैसे के प्रदर्शन और किताबी पढाई के अलावा किसी और क्षेत्र में कभी झंडे नहीं गाड़े, अन्यथा दिमाग का वो कम धनी नहीं था।


(जारी...)

Tuesday, September 14, 2010

द्वंद्व

बुढ़ापे की झुर्री, और शीशे की लकीर;
दोनों की तरफ _
बहुयें देखती ही नहीं।

हाये...
ये कैसी विडम्बना है।

कहती हैं_

लकीर पड़े शीशे देख, रिश्ते साथ नहीं चलते;
और लकीर पड़े चेहरे के साथ...
रिश्ते चला नहीं सकते।

About Me

मैं जिंदा हूँ, मगर ज़िंदगी नहीं हूँ; मुझपे मरने की ग़लती करना लाज़िम नहीं है|

Followers